रणथंभौर की पृष्ठभूमि :
रणथंभौर अभयारण्य का नाम मूल रूप से रणथंभौर दुर्ग के नाम पर है। अरावली एवं विंध्याचल पर्वत शृंखला की संगम स्थली पर स्थित यह अभयारण्य व इसके बीच स्थित रणथंभौर दुर्ग अपनी एक पहचान लेकर खड़ा हुआ है। पूर्व में यह वन क्षेत्र जयपुर रियासत की शिकारगाह रहा है। इसमें जयपुर घराने के राजाओं ने, उनके अतिथियों ने हजारों वन्यजीवों का शिकार किया। यह सिलसिला आजादी के बाद तक भी जारी रहा लेकिन 7 नवंबर 1955 को यह जंगल राजस्थान सरकार के अधीन आने के बाद सवाई माधोपुर वन्यजीव अभयारण्य घोषित किया गया जो 1972 तक रहा। वर्ष 73 में इसे टाईगर प्रोजेक्ट का दर्जा दिया गया। उस समय इसमें बाघों की संख्या लगभग 15 मानी जाती थी जो 89 में 50 और 92 में यह घटकर लगभग 15 हो गई जो 99 में 30 तक पहुंच गई। आज इनकी संख्या लगभग 39 मानी जा रही है। रणथंभौर बाघ परियोजना क्षेत्र का कुल क्षेत्रफल 1394.478 वर्ग किमी माना जाता है जिसमें रणथंभौर राष्ट्रीय अभयारण्य का क्षेत्रफल 382.03 वर्ग किमी है जिसे विभाग बढ़ाकर 13 सौ वर्ग किमी करने की तैयारी कर रहा है।
राज्य के सभी 27 वन्यजीव अभयारण्यों में अपेक्षाकृत रणथंभौर अभयारण्य की स्थिति अच्छी कही जा सकती है। यह अपने आप में राष्ट्रीय ही नहीं विश्व स्तरीय पहचान के कारण मॉडल अभयारण्य के रूप में जाना जाने लगा है। इसके बावजूद यह अभयारण्य भी अवैध शिकार की समस्या से अछूता नहीं कहा जा सकता। कुछ वर्ष पूर्व युवराज नाम के एक बाघ का शिकार हुआ था। पांच माह पूर्व ही दो और बाघों के शिकार के मामले सामने आए हैं। पालतू पशुओं पर हमलों से परेशान ग्रामीणों द्वारा वन्य शावकों को मारे जाने की घटनाएं भी यदाकदा होती रहती हैं। इलाके को लेकर हुए संघर्ष में भी दो बाघिनों की मृत्यु हो चुकी है। बाघों के साथ अधिकांश वन्यजीव प्रजातियों की प्रचुरता के कारण इस अभयारण्य पर राज्य एवं भारत सरकार के साथ विश्व स्तर की संस्थाओं की भी हर समय नजर रहती है। अभयारण्य को राजस्थान के अभयारण्यों का सिरमौर एवं देश के प्रमुख अभयारण्यों में से गिना जाता है। आज राज्य सरकार रणथंभौर अभयारण्य के माध्यम से दूसरे बाघ विहीन हुए अभयारण्यों को दोबारा बाघों से आबाद करने के लिए केन्द्र सरकार की मदद से काम कर रही है।
‘रणथम्भौर’’ शब्द की व्युत्पत्ति ‘‘रण’’ व ‘‘थम्भौर’’इन दो शब्दों के मेल से हुई है। ‘‘रण’ व ‘‘थम्भौर’’ दो पहाडियां है। थम्भौर वह पहाडी है जिस पर रणथम्भौर का विश्व प्रसिद्घ किला स्थित है और ‘‘रण’’ उसके पास ही स्थित दूसरी पहाडी है। रणथम्भौर का किला लगभग सात किलोमीटर के विशाल क्षेत्र में फैला हुआ है, जहां से रणथम्भौर राष्ट्रीय पार्क का विहंगावलोकन किया जा सकता है।
रणथम्भौर दुर्ग भारत के सबसे पुराने किलों में से एक माना जाता है। इस किले का निर्माण सन् 944 ए.डी. में चौहान वंश के राजा ने करवाया था।
इस दुर्ग पर अल्लाउदीन खिजली, कुतुबुद्दीन ऐबक, फिरोजशाह तुगलक और गुजरात के बहादुरशाह जैसे अनेक शासकों ने आक्रमण किये। यह मान्यता रही है कि लगभग 1000 महिलाओं ने इस किले में ‘जौहर’ किया था। ‘‘जौहर’’ (जिसके अंतर्गत किलों को अन्य शासक द्वारा जीत लेने पर वहां की निवासी राजपूत महिलाएं अपने ‘शील’ की रक्षा के लिए जलती आग में कूद कर अपनी जीवन लीला समाप्त कर लिया करती थी।)
उन्होंने तथ्यों का हवाला देते हुए बताया कि ग्यारहवीं शताब्दी में राजा हमीर ने और सन् 1558-59 में मुगल बादशाह अकबर ने इस दुर्ग पर अपना अधिकार जमाया था। अंततः यह दुर्ग जयपुर के राजाओं को लौटा दिया गया था, जिन्होंन दुर्ग के आस पास के जंगल को शिकार के लिए सुरक्षित रखा।
जंगल के संरक्षण की यही प्रवृत्ति बाद में रणथम्भौर राष्ट्रीय पार्क के अभ्युदय का कारण बनी और आज देश-विदेश से सैलानी यहां बाघ और अन्य वन्य प्राणियों को देखने आते हैं।
रणथम्भौर- सवाई माधोपुर जिला मुख्यालय से 13 किमी. की दूरी पर स्थित रणथम्भौर का दूर्ग राजस्थान के महत्वपूर्ण दुर्गों में से एक हैं। ऊंची पहाडी पर स्थित इस दुर्ग में त्रिनेत्र गणेशजी का भव्य मंदिर स्थित हैं।
यहाँ देश के कौने-कौने से श्रृद्धालु आकर शादी-विवाह, फसल की बुवाई एवं अन्य मांगलिक अवसरों पर गणेशजी को प्रथम आमंत्रण देते हैं। गणेशजी के इस पवित्र स्थान पर वर्ष भर यात्रियों का तांता लगा रहता हैं तथा प्रत्येक बुधवार को यहाँ आने वाले यात्रियों की भीड लघु मेले का रूप ले लेती है।
रणथम्भौर दुर्ग अपनी प्राकृतिक बनावट तथा सुरक्षात्मक दृष्टि से भी अद्वितीय स्थान रखता हैं। ऐसा सुरक्षित, अभेद्य दुर्ग विश्व में अनूठा हैं।
दुर्ग क्षेत्र में गुप्त गंगा, बारहदरी महल, हम्मीर कचहरी, चौहानों के महल, बत्तीस खंभों की छतरी, देवालय एवं सरोवर ऐतिहासिक दृष्टि से महत्पवूर्ण हैं।
दुर्ग में स्थित हम्मीर महल में पुरातात्विक महत्व के हथियार जिरह बख्तर एवं अन्य महत्वपूर्ण सामग्री उपलब्ध हैं।
कहा जाता रहा है कि यदि बाघ देखना हो तो रणथंभौर जाना चाहिए। यहां बाघ अब मनुष्यों से नहीं घबराते। इन्हें दिन में घूमते तथा शिकार करते हुए देखा जा सकता है।
कभी-कभी अपने बच्चों के साथ अस्वाभाविक रूप से निश्चिंत होकर विचरते दिख जाते हैं। ऊपरी भागों में तेंदुआ मिल जाता है। यहां रीछ, लकड़बग्घा, सांभर, चीतल,नीलगाय, जंगली सुअर, चिंकारा, नेवला, खरगोश भी पाए जाते हैं। पक्षियों में चील, क्रेस्टड सरपेंट ईगल, ग्रेट इंडियन हॉर्न्ड आउल, तीतर, पेंटेड तीतर, क्वैल, स्परफाइल मोर, ट्री पाई और कई तरह के स्टॉर्क देखे जा सकते हैं। यहां राजबाग तालाब, पदम तालाब, मिलक तालाब जैसे सुंदर स्थल अनेक प्रकार के जानवरों को आकर्षित करते हैं और इनका शिकार करने की कोशिश में रहते हैं मांसाहारी जानवर। इस पार्क की झीलों में मगरमच्छ भी हैं।
रणथंभौर जैसे विश्वविख्यात अभयारण्यों में "फुट ट्रेप" के जरिये बाघों को घायल करके किस तरह उनकी तस्करी करके करोड़ों के वारे-न्यारे हो रहे हैं। कुछ शिकारी पकड़े जाते हैं, लेकिन सख्त कानूनों के बावजूद बच निकलने में कामयाब हो जाते हैं। भारत में बाघों की घटती संख्या पर अनेक सेमिनार और गोष्ठियां होती रहती हैं, लेकिन सकारात्मक नतीजा कभी सामने नहीं आ पाता।
राजस्थान और मध्यप्रदेश समेत 17 राज्यों में बनाए गए टाइगर प्रोजेक्ट खस्ता हालत में हैं, लेकिन उनकी सुध लेने वाला कोई नहीं। देश की तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी की आत्मा आज इन अभयारण्यों की दुर्दशा देखकर तड़प रही होंगी। प्रोजेक्ट के लिए आवंटित की गई राशि का भी ढंग से इस्तेमाल नहीं हो पा रहा है। योजनाएं बन रही हैं, लेकिन उन पर प्रभावी अमल हो भी रहा है या नहीं, इसकी मॉनीटरिंग के लिए कोई सुदृढ़ व्यवस्था नहीं है। दूसरी तरफ वन्यजीवों की जान के दुश्मन बने शिकारियों का नेटवर्क इतना मजबूत है कि वे तमाम चौकसी के बावजूद अपने खतरनाक इरादों को अंजाम देने में सफल हो जाते हैं।
पूरी दुनिया में केवल 3500 बाघ बचे हैं, जिनमें से 1411 भारत में हैं। यह सब तब हो रहा है जबकि पूरी दुनिया इस संकटग्रस्त प्रजाति की संख्या में तेजी से होती गिरावट पर शोर मचा रही है। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने बाघों को बचाने के लिए कदम उठाने का फैसला किया और पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश ने बाघों की मौत के लिए राजनेताओं द्वारा समर्थित माफिया को जिम्मेदार ठहराया है।
भारतीय बाघों पर है चीनी तस्करों की नजर
मालूम हो कि चीन में इयर ऑफ टाइगर हर बारह साल बाद पड़ता है। चीनी ज्योतिष में बाघ राज शक्ति और जुनून का प्रतीक है। ऐसे में चीनी लोग घरों को बाघ की खाल और उसके अंगों से सजाते हैं। लोगों की इस मांग को पूरा करने के लिए चीनी तस्कर पूरी दुनिया से बाघों का शिकार करवाते हैं लेकिन खास निशाने पर भारतीय बाघ रहते हैं।
चीन के पिछले इयर ऑफ टाइगर 28 जनवरी 1998 से 15 फवरी 1999 के दौरान भारतीय वनों से कई बाघ गायब हुए थे। उस वक्त चीनी तस्करों ने भारत में शिकारियों को मोटी रकम देकर बाघों का खूब शिकार कराया था।
साल 2008 की गणना के मुताबिक देश में कुल 1411 बाघ हैं, जो विश्व के बाघों की आधी आबादी। लेकिन 1997 में भारत में बाघों की तादाद 3508 थी, यानी 11 साल में बाघों संख्या घटकर एक तिहाई रह गई है। बाघों की घटती संख्या की सबसे बड़ी वजह इनका शिकार है।
बाघ, सरकार और मौत का सिलसिला
जिस तेजी के साथ बाघों की मौत होती जा रही है उससे लगता है वो दिन दूर नहीं जब डायनासोर की तरह बाघ भी बीते जमाने के प्राणी हो जाएंगे। भारत की बात करें तो इस साल अब तक कम से कम 13 बाघों की मौत हो गई है, जबकि पिछले साल 60 बाघों की मौत हुई थी। अभी जो आंकड़े मौजूद हैं उनके मुताबिक, पूरी दुनिया में केवल 3500 बाघ बचे हैं। भारत में बाघों की कुल संख्या 1411 हैं। बाघों की ये संख्या उनके अस्तित्व को लेकर बेहद गंभीर खतरे के संकेत दे रहे हैं। ये संकेत साफ कह रहा है कि अगले कुछेक सालों में बाघ इस दुनिया से ही गायब हो जाएंगे। भारत में ये स्थिति काफी भयंकर है। भयंकर इसलिए कि बाघों की सुरक्षा पर सरकार का कोई ध्यान नहीं है। सरकार ऐसी कोई ठोस कोशिश नहीं कर रही है जिससे बाघों की संख्या में इजाफा किया जा सके। उल्टे हर साल बाघों की संख्या में कमी ही आती जा रही है। इस साल अब तक जो मौत का सिलसिला जारी है। उसे देखकर ये यकीन करना तो कठिन है कि बाघों के अस्तित्व की समस्या का समाधान हो पाएगा। बाघ ऐसे समय में तेजी से समाप्त होते जा रहे हैं जब सारी दुनिया में इस संकटग्रस्त प्रजाति को बचाने के लिए शोर मच रहा है। वैसे केंद्र सरकार की बात करें तो प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने बाघों को बचाने के लिए कदम उठाने का फैसला किया है, लेकिन कार्रवाई और नतीजों के मामले में शून्य के सिवा कुछ दिखाई नहीं दे रहा। पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश ने बाघों की मौत के लिए राजनेताओं द्वारा समर्थित माफिया को जिम्मेदार ठहराया है। अब ऐसे में आप सोच सकते हैं सरकार बाघों को बचाने के लिए क्या कर रही है और क्या करने की मंशा रखती है। जब आप अपनी जिम्मेदारी से भागेंगे और दोष किसी और के माथे पर मढ़ेंगे तो फिर ये तो मानना ही पड़ेगा कि मामले को हल्के में लिया जा रहा है। देश का कोई भी अभ्यारण्य ऐसा नहीं है जो सरकार के नियंत्रण से बाहर हो, ऐसे में जंगल को बचाने और उसके विकास की दिशा में यदि कोई कारगर कदम उठा सकता है तो वो सरकार ही उठा सकती है। अब अगर सरकार अपनी जिम्मेदारी से भागेगी तो फिर आम जनता तो चिन्ता करेगी ही। वन और वन्यजीव के संरक्षण को लेकर सरकार को ठोस कार्रवाई करने की जरूरत है। सिर्फ कानून बना देने मात्र से समस्या का कोई समाधान नहीं हो सकता। भारत में बाघों की जो संख्या है उससे देखते हुए ये कहा जा सकता है कि अब बाघों की समस्या ऐसी नहीं है कि उसके समाधान के लिए सिर्फ कानून पर ही निर्भर रहा जाए। अब जरूरत है कि कानून के साथ-साथ सरकार और जनता इस समस्या के समाधान के लिए सक्रिय भागीदारी करे। हालांकि बाघों के अस्तित्व को लेकर वैश्विक स्तर पर चर्चाएं तो हो रही हैं लेकिन जो नतीजा निकलना चाहिए वो निकलकर सामने नहीं आ रहा। देश के अभयारण्यों में बाघों के सामने जीने के लिए गंभीर चुनौती खड़ी है। शिकार, आपसी संघर्ष और ग्रामीणों से आमना-सामना होने के चलते बाघों की मौत का सिलसिला जारी है। बाघ के अंगों और हड्डियों की अंतरराष्ट्रीय बाजार में काफी कीमत है, इस वजह से भी बाघों के जान को खतरा बना रहता है। भारत में बाघों के अंगों के व्यापार पर 1975 में पाबंदी लगाई गई थी, जो संयुक्त राष्ट्र के वन्यजीव संगठन सीआईटीईएस के तहत उठाए गए शुरुआती कदमों में से एक है। सीआईटीईएस की सूची-1 में बाघ उन जंतुओं में शामिल है जिनकी प्रजाति को खतरा बना हुआ है। सीआईटीईएस ने ये स्वीकार किया है कि अब तक बाघों को बचाने के सारे प्रयास नाकामयाब रहे हैं। बाघो के अस्तित्व को बचाना अब काफी गंभीर चुनौती बन चुकी है। यदि अभी बाघों की सुरक्षा पर ध्यान नहीं दिया गया तो फिर ये जानवर हमेशा हमेशा के लिए इस दुनिया से विदा हो जाएगा।
नई सोच के साथ हो बाघों का संरक्षण
दरअसल, पहले तो हमें यह समझने की जरूरत है कि देश में अगर इतने बाघ भी बचे हैं तो यह बहुत अच्छी बात है। बाघों को रहने के लिए जगह चाहिए होती है। उन्हें इधर-उधर घूमने के लिए भी खुली जगह की जरूरत होती है।
एक नए बाघ के जन्म के साथ ही वह अपने लिए जगह की तलाश शुरू करने लगता है। यह जगह या तो उन्हें बूढ़े हो चुके बाघों से मिलती है या फिर नया जन्मा बाघ खुद अपने लिए जगह तलाशने में जुट जाता है। मगर वह जिस खुली जगह की तलाश कर रहा है, अब वह कहां बचा है। हमारे आस पास सभी पार्क और जंगल तो तबाह हो चुके हैं।
बाघों के अभयारण्य के नजदीक रहने वाले लोग इन्हें सख्त नापसंद करते हैं क्योंकि भूले भटके जब बाघ उनके क्षेत्र में घुस आते हैं तो उनके जानवरों को अपना शिकार बना लेते हैं। उनके लिए अभयारण्यों का भी महत्त्व नहीं है क्योंकि यहां शाकाहारी जानवर भी रहते हैं जो उनकी फसलों को बरबाद कर देते हैं।
बाघों के इलाके के आसपास रहने से उन्हें कोई फायदा नहीं होता है और इस वजह से उन्हें बाघ पसंद नहीं आते हैं।
पार्क के अंदर सुरक्षित रखने के लिए तमाम कदम उठाते हैं। पर बाघों की संख्या फिर भी नहीं बढ़ती है। खुले जगह की तलाश में बाघों के बच्चे सुरक्षित इलाकों से बाहर निकल आते हैं। एक समय था जब जंगलों का क्षेत्रफल काफी अधिक हुआ करता था। उन दिनों अगर बाघ अपने इलाके से निकल भी जाते तो शायद उन्हें कोई खतरा नहीं होता।
मगर अब धीरे धीरे जंगल नष्ट होते जा रहे हैं। जंगलों के आस पास के इलाकों में जो लोग रह रहे हैं वे गरीब हैं और गुस्साए हुए हैं। हाल ही में रणथंभौर में जो हुआ वह इसी का नतीजा है। यहां दो छोटे बाघों को जहर देकर मार दिया गया। ऐसी घटनाएं होती रहती हैं।
इस खूनी खेल में किसी की हार या जीत नहीं होती है और यही वजह है कि हमें इधर-उधर घूमने वाले बाघों और उन गरीब लोगों के बीच शांति बहाल करने की कोशिश करनी चाहिए जिन्हें बाघों के संरक्षण का फायदा मिलना चाहिए। हमें इन दोनों के बीच सामंजस्य बिठाने का काम करना चाहिए।
अब तक की नीतियों से अभयारण्यों के आस पास रहने वाले लोगों को संरक्षण से कुछ नहीं मिला है। बीते वर्षों में कम निवेश और पौधारोपण के विषय में कम समझ की वजह से अभ्यारण्यों के बाहर पेड़ों का अभाव है। लोगों के पास दूसरा कोई विकल्प ही नहीं है और उन्हें संरक्षित इलाकों में अपने मवेशियों को चरने के लिए भेजना पड़ता है।
फिर जब मांसाहारी जानवर जंगलों में प्रवेश करते हैं तो शाकाहारी जानवर वहां से बाहर निकल कर खेतों में फसलों को बरबाद करते हैं। इस तरह ऐसे लोगों और बाघों में द्वंद्व बढ़ता ही जा रहा है। रणथंभौर के आस पास के गांवों में लोगों ने मुझे बताया कि उनकी जिंदगी तो पक्षियों की जिंदगी से भी बेकार हो गई है।
पक्षी तो कम से कम रात में कुछ समय के लिए सो सकते हैं मगर उन्हें तो रात में भी जंगली जानवरों से अपने मवेशियों और फसलों को बचाने के लिए जागना पड़ता है। तो अगर हमें बाघों के संरक्षण के लिए और जमीन की जरूरत होगी तो हमें यह सच्चाई समझनी होगी। सबसे पहले तो यह कि जिन लोगों की फसलें बरबाद हुई हैं और जिनके मवेशी मारे गए हैं उन्हें तत्काल उसका मुआवजा दिया जाए।
दूसरी बात यह कि बाघों के अभयारण्यों के आस पास के इलाकों को तीव्र गति से विकास किया जाए। जो लोग इन इलाकों में रह रहे हैं उन्हें इसका फायदा दिया जाना चाहिए। तीसरी बात कि उन्हें संरक्षण का सीधा लाभ मिलना चाहिए। उन्हें संरक्षण से जुड़ी नौकरियों में तवज्जो मिलनी चाहिए।
बाघों की वजह से पर्यटन के जरिए जो कमाई होती है उनमें उन लोगों को हिस्सेदारी मिलनी चाहिए। बाघ संरक्षण का यही एजेंडा है।
बाघों की संख्या बढ़ाने के लिए बने अभयारण्य ही आज उनकी कब्रगाह बन गये हैं
रणथंभौर बाघ अभयारण्य पर पिछले आठ वर्षों में 40 करोड़, 21 लाख, 41 हजार रूपये खर्च किये गये हैं. जिसके अनुसार अनुमानतः एक बाघ पर पांच करोड़ रूपये खर्च किये गये. बाघों की संख्या में गिरावट के लिए मुख्यरूप से अवैध शिकार करके उनके अंगों का व्यापार करनेवाले व्यापारी ही जिम्मेदार हैं. सवाल है ये गिरोह किसकी मिलीभगत से पनपते हैं? ऐसा क्यों होता है कि बाघों के संरक्षण के लिए खड़े किये गये तंत्र ऐसे गिरोहों की गतिविधियों पर काबू पा सकने के लिए पर्याप्त नहीं हैं. सरकारी अमला भ्रष्ट, लापरवाह और लालची हो सकता है पर समाज को क्या हुआ है?
साफ है कि अभयारण्य बाघों को बचाने के कारगर उपकरण साबित नहीं हुए हैं
बाघों की चिंता मात्र उनका रोजगार है!
नामचीन बहुराष्ट्रीय कंपनियों द्वारा इन दिनों भारत में ‘सेव अवर टाइगर्स्’ अभियान इण्टरनेट सहित अन्य तमाम तरह के प्रचार माध्यमों से बड़े पैमाने पर चलाया जा रहा है। सवाल है कि क्या इससे बाघों की लगातार घटती संख्या में कोई कमी आ पायेगी? शायद नहीं, क्योंकि बाघों को बचाने के लिए ज़मीनी स्तर पर वन क्षेत्रों में इनके नाम पर हो-हल्ला मचाने वालों के द्वारा कोई भी प्रयास नहीं किए जा रहें हैं। कम्पनी हो या फिर तथाकथित वाइल्ड लाइफर हों वे केवल बयानबाज़ी के द्वारा बाघों के सहारे स्वयं को हाईफाई साबित करके अपनी ख्याति का डंका बजवाने के लिये सिर्फ बाघों के नाम को बेचने का काम कर रहे हैं।
दरअसल वनों की सुरक्षा व संरक्षण से इनका कोई वास्ता नहीं है, वरना वे फील्ड में आगे आकर काम करते जहां बाघ संरक्षण की तमाम संभावनाए मौजू़द हैं।
प्रचार माध्यमों पर ऐसी कई कम्पनियां करोड़ों रुपया पानी की तरह क्यूं बहा रही हैं और इस बात का प्रचार शहरी क्षेत्रों में करके किस लक्ष्य को हासिल करना चाहते हैं? इन सवालों के पीछे छुपे तथ्यों को जानना बहुत ज़रूरी है। हालांकि ऊपरी तौर पर लगता यही है कि भारत ही नहीं वरन् दुनियाभर के लोग जागरुक होकर बाघों के प्रति संवेदनशीलता के साथ इनके संरक्षण में जुट जाऐं। जबकि वनक्षेत्रों में रहने वाला आदिवासी वनाश्रित समाज और आम नागरिक समाज जो जंगल और जमीन से सीधे तौर पर जुड़ा है वह पहले से और आज भी बाघों से लगाव रखता है। बाघों के प्रति अगर लगाव नहीं था तो केवल अग्रेजों, जमीदारों, राजा-महराजाओं, नवाबों और अभिजात वर्ग के शिकारियों का, जो बाद में बाघ संरक्षकों के रूप में विश्वविख्यात हो गए। यह लोग बाघ की हत्या कर उसके शव पर पैर रखकर फोटो खिंचवाना तथा बाघछाला को अपने सिंहासन पर बिछाना और आधुनिक युग में अपने ड्राइंगरूम में सजाना अपनी शान समझते थे। अंग्रेजी हुकूमत के देश में नहीं रहने पर आजाद भारत में भी सन् 1972 से पहले तक बाघों का शिकार होता रहा और वन विभाग द्वारा इनका शिकार करने के लाईसेंस भी दिये जाते रहे हैं। परिणामतः देश में बाघों की दुनिया सिमटने पर नींद से जागी केन्द्र सरकार ने बाघ, तेंदुआ आदि विलुप्तप्राय होने वाले वन-पशुओं के शिकार पर प्रतिबंध लगाने वाला वन्यजीव-जंतु संरक्षण अधिनियम-1972 बना दिया। जबकि कड़वी सच्चाई ये है कि इस कानून के पास किये जाने के ठीक एक दिन पूर्व ही बाकायदा अधिसूचना जारी करके बाघ, तेंदुआ सहित कई प्रजातियों के वन्यजीवों को जंगल का दुश्मन करार देते हुये बड़ी संख्या में मार दिया गया था। हालांकि इसके बाद भी बाघों का अवैध शिकार जारी रहा, अब अगर परोसे जा रहे आंकड़े पर विश्वास करें तो देश में मात्र 1411 बाघ बचे हैं, जिन्हें बचाने के लिए इन तथाकथित सुधिजनों द्वारा ढिंढोरा पीटा जा रहा है।
ऐसा नहीं है कि बाघ केवल अवैध शिकार की भेंट चढे़ हों, अन्य तमाम तरह के कारण भी इसके पीछे मौजू़द रहे हैं। इनमें वनों का अवैध कटान, आबादी का विस्तार, अवैध खनन, शहरीकरण, प्राकृतिक एवं दैवीय आपदा आदि मुख्य कारण हैं। इसका पूरा-पूरा लाभ पूंजीपतियों ने ही उठाया जबकि घाटा वनवासियों एवं जंगल के निकटस्थ बस्तियों में रहने वाले गरीब तबकों के खाते में आया और आज भी उन्हीं को दोषी करार देकर उनको जंगल से बाहर खदेड़ने या वन के भीतर न घुस पायें इसका षडयंत्र रचा जा रहा है।
इस पूरे षडयंत्र के पीछे इन कम्पनियों के निहित स्वार्थ को न सिर्फ मीडिया तंत्र पूरी तरह से नज़रअन्दाज़ किये हुये है, बल्कि सरकारें भी आंख मूंद कर ये तमाशा चुपचाप देख रही हैं। दरअसल इन बहुराष्ट्रीय कम्पनियों को अपने उद्योग कारखाने लगाने के लिये ज़मीनों की बड़ी मात्रा में ज़रूरत होती है और इन कारखानों के लिये कच्चे माल की आसानी से उपलब्धता अधिकांशतः जंगल क्षेत्रों से ही होती है। यही कारण है कि कारखानों के लिये वनभूमि इनके लिये सबसे मुफीद जगह होती है जिसे समुदायों की मौजूदगी में वनविभाग व सरकारों को सस्ते दामों में पटा कर हासिल करना इनके लिये खासा मुश्किल काम हो जाता है। समुदायों को जंगल क्षेत्रों से हटाने के लिये अख्तियार किये गये तमाम तरह के रास्तों में एक रास्ता यह भी अपनाया जा रहा है कि उन्हें शिकारी और तस्कर साबित करते हुये जंगल क्षेत्रों से हटाने के लिये एक ऐसी मुहिम छेड़ दी जाये जिससे आम नागरिक समाज में भी वन समुदायों के खिलाफ एक भ्रम फैल जाये और जंगल क्षेत्रों में इनके समर्थन में वनविभाग व सरकारों द्वारा अंजाम दी जा रही दमन की कार्यवाहियों पर ‘सेव अवर टाईगर्स‘ के नाम पर न्याय की मुहर लग सके। आज जबकि वनाधिकार कानून-2006 लागू किया जा चुका है जिसमें स्वीकार किया गया है कि वनों के संरक्षण में ऐतिहासिक तौर पर वनसमुदायों की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। उनके अधिकारों को अभिलिखित न करके उनके साथ ऐतिहासिक अन्याय हुआ है। लेकिन वनविभाग इन बड़ी कम्पनियों की मदद से इस कानून के क्रियान्वन की पूरी प्रक्रिया को ही ध्वस्त करके इन जनविरोधी कृत्यों को अंजाम देने में मशगूल है। अपने आपको जंगलों का रखवाला बताने वाला वन विभाग आज भी देश के सबसे बड़े जमींदार की भूमिका निभा रहा है। इसके द्वारा अंजाम दिये जा रहे अत्याचार, शोषण, उत्पीड़न और अवैध वसूली की त्रासदी से परेशान वनवासी एवं गरीब वन सुरक्षा एवं वन्यजीवों के संरक्षण से धीरे-धीरे किनारा करते गए और वन विभाग भी वन सुरक्षा एवं वन्यजीव संरक्षण व प्रोजेक्ट टाईगर के कार्यों में पूरी तरह से असफल ही रहा है। कागजों में करोड़ो पेड़ लगवाने के बावज़ूद वन विभाग हरे-भरे जंगल का क्षेत्रफल आज तक नहीं बढ़ा पाया। वह भी तब जबकि आजा़दी के बाद से लेकर अब तक सरकारों ने बेशुमार अधिसूचनायें जारी करके लोगों की खेती व काश्त की यहां तक कि निवास की भी लाखों हेक्टेअर ज़मीनों को जंगल में समाहित करके वनभूमि में इज़ाफा करने का काम किया है। वन विभाग वन्यजीव प्रबंधन में भी बुरी तरह से असफल ही रहा है। परिणामतः वन्यजीवों की संख्या घटती ही जा रही है और प्रोजेक्ट टाईगर की असफलता भी जगजाहिर हो चुकी है। ऐसी विषम परिस्थितियों में नीति निर्धारकों द्वारा इसका समय रहते मूल्याकंन कराया जाना जरूरी है।
‘सेव अवर टाईगर्स’ अभियान में लगी इन कंपनियों के मंतव्य को देखा जाए तो वह केवल बाघ के नाम पर मात्र अपनी स्वार्थपूर्ति के लिये ही प्रचार-प्रसार कर रही है। इनका बाघों के संरक्षण से कोई लेना-देना नहीं है। अगर वास्तव में बाघों को बचाने में इनकी कोई रुचि होती तो प्रचार पर करोड़ों रुपए खर्च करने के बजाय वे वन एवं वन्यजीव संरक्षण जिसमें बाघ भी शामिल है उसके लिए फील्ड यानी वनक्षेत्रों में सार्थक प्रयास करतीं। जितना रुपया टीवी, अखबार विज्ञापन और खिलाड़ियों व माडलों पर व्यय किया जा रहा है। उतना रुपया अगर वन्यजीव सम्बंधी जिन कार्य योजनाओं के क्रियान्वयन में वन विभाग नाकाम रहा है ऐसे क्षेत्रों को चिन्हित करके वन प्रबंधन के कार्य करा दिए जाते या वनाधिकार कानून को सफल रूप से क्रियान्वित कराने के काम पर खर्च किया जाता तो वनसमुदायों तथा जंगलों के साथ-साथ बाघों का भी भला हो सकता था।
हमारे सामर्थ्य की परीक्षा है बाघ
क्या भारत बाघों को बचा सकता है? यह सवाल सिर्फ भारत ही नहीं उसकी सीमाओं के बाहर भी महत्वपूर्ण है। यह सवाल विकास की उस राह से भी जुड़ा है, जो एशिया ने पकड़ी है। इस सवाल के जवाब से इस बात की परख भी हो जाएगी कि हमारे विशेषज्ञों की फौज और हमारी लोकतांत्रिक संस्थाएं कितनी प्रभावी हैं। इस सवाल के लिए कई सदी पहले का अतीत महत्वपूर्ण नहीं है। सदियों तक इंसान और मांसाहारी शिकारी जंगली जानवरों की लड़ाई चली है।
तमिलनाडु के बच्चे आज भी बोमाका नाम की उस पराक्रमी भैंस की कहानी सुनते हैं, जिसने एक बाघ का मुकाबला करके अपने बछड़े की जान बचाई थी। लेकिन इस सवाल के लिए इसका कोई अर्थ नहीं। वाल्मीकी रामायाण में राम और लक्ष्मण का जिक्र बाघ की तरह हुआ है। दो सदी पहले अंग्रेजों से लोहा लेने वाले शासक टीपू सुल्तान ने बाघ को अपने राज्य का प्रतीक बनाया था। और जब आजद हिंद फौज को एक प्रतीक की जरूरत पड़ी तो सुभाष चंद बोस ने फुर्तीले बाघ को ही चुना।
लेकिन पिछली सदी में यह कहानी पूरी तरह से बदल गई। भारी तादाद में बाघों को राजओं, राजकुमारों और ब्रिटिश अफसरों ने मारा। दशकों तक सरकार बाघ, बाघिन और शावकों को मारने पर ईनाम देती रहीं। एक सदी पहले तक साल भर में 1600 के करीब ऐसे बाघ मारे गए , जिनके लिए बाकायदा ईनाम बंटे। ये आंकड़ा अतिश्योक्ति भरा है, क्योंकि यह बाघों की कुल संख्या से ज्यादा है।
भारत का नाम उन देशों में है, जो सबसे पहले बाघ को बचाने की मुहिम में शामिल हुए। 1972 में इसे राष्ट्रीय पशु घोषित किया गया और एक साल बाद इसके लिए कई आरक्षित अभयारण्य बनाए गए। आज ये आरक्षित अभयारण्य ही हैं, जहां बाघ सुरक्षित रह सकते हैं। ये अभयारण्य कुदरत के अध्ययन की प्रयोगशाला हैं। इसके पीछे की सोच बाघ को महत्वपूर्ण मानकर बचाने की नहीं है, बल्कि यह कुदरत को बचाने की इंसानी कोशिश का एक हिस्सा है। बाघ भारत के पर्यावरण और संस्कृति की विविधता का प्रतीक है।
इस समय भारत में 40 हजर किलोमीटर क्षेत्र ऐसा है, जिसमें बाघ रह सकते हैं। इस जंगल में कटान और खेती की इजIजत नहीं है। यहां न खनन हो सकता है, न बांध बनाए जा सकते हैं, न राजमार्ग बन सकते हैं और न विद्युत संयंत्र। पर्यावरण में बदलाव की नई चिंता जो दुनिया भर में दिखाई दे रही है, उसमें इस तरह के जंगल बहुत महत्वपूर्ण हैं, क्योंकि वे हमें बताते हैं कि कुदरत कैसे काम करती है। जिसे हम प्रोजेक्ट टाइगर कहते हैं उसका महत्व महज बाघ से कहीं ज्यादा है। 1973 में जब प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने इस प्रोजेक्ट की शुरूआत की थी तो उन्होंने कहा भी था कि यह परियोजना विडंबनाओं से भरी है। इस जंगल के साथ जिस पशु की पहचान जुड़ी है, वह खुद खतरे में हैं और उसे बचाने के लिए विशेष प्रयास की जरूरत है।
चार साल पहले जब एक पार्क में बाघों के सफाए की खबर आई थी तो प्रधानमंत्री ने टाइगर टास्क फोर्स का गठन किया था। इसके साथ ही वह शुरूआत हुई थी, जिसमें वज्ञानिकों और नागरिकों को पर्यावरण संरक्षण की कोशिशों में शामिल किया गया। इस लिहाज से केंद्रीय पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश का यह बयान काफी महत्वपूर्ण हो जाता है कि बाघों के बारे में आकलन करने में विज्ञान का इस्तेमाल बहुत ज्यादा नहीं हुआ है। वैसे भी जंगल में रहने वाली ऐसी किसी आबादी के लिए सटीक आकलन आसान भी नहीं है। पिछले तीन दशकों से भारत के जंगलात से जुड़े लोग खुरों के निशान से ही बाघों की पहचान और उनकी संख्या के अनुमान लगा रहे हैं।
वैसे बाघों की पहचान की कैमरा ट्रैप तकनीक का इस्तेमाल कई भारतीय वैज्ञानिकों ने किया लेकिन यह इस्तेमाल सीमित स्तर पर ही हुआ। ऐसी तकनीक को बड़े स्तर पर इस्तेमाल किया जाना जरूरी है। इस लिहाज से मंत्री का बयान स्वागत योग्य तो है लेकिन सब कुछ इस पर निर्भर करेगा कि आने वाले समय में संरक्षण के लिए विज्ञान का इस्तेमाल कितना और किस तरह से किया जाता है। दक्षिण एशिया के सभी देश, चीन और रूस वगैरह सभी ने नई तकनीक का इस्तेमाल शुरू कर दिया है, लेकिन हमारे देश में इसे अभी नजरंदाज किया जा रहा है।
क्या यह वाकई महत्वपूर्ण है कि हम बाघों और उनके शिकारों की संख्या का आकलन कैसे-कैसे करते हैं। नि:संदेह यह महत्वपूर्ण है। इससे हमें यह पता चलता है कि हम जो नीतिया अपना रहे हैं, वे सही नतीजे दे रही हैं या नहीं। खुर्रा जंच की तकनीक उस समय की है जब शिकारी बाघ का पीछा किया करते थे, उन्हें बचाने के युग में ये ज्यादा काम नहीं आने वाली। नई तकनीक हमें यह बता सकती है कि जंगल किस दिशा में विकसित हो रहा है।
विज्ञान उसी समाज में सही अंजम दे पाता है जिसमें नए विचारों के लिए खुलापन हो। हमारे पास जैविक और सामाजिक दोनों ही तरह की विशेषज्ञता है और हम 1970 से इस दिशा में लगातार कोशिश भी कर रहे हैं। इस बात को अक्सर अनदेखा कर दिया जता है कि चीन और दक्षिण पूर्व एशिया के हमसे कहीं ज्यादा अमीर देशों के पास बहुत बड़े जंगल हैं लेकिन वन्य जीवों के मामले में वे लगभग खाली पड़े हैं। अभी भी भारत और उसके पड़ोसी देश ही हैं, जहां बाघ और गैंडे जैसे जीवों को काफी हद तक बचाया ज सका है। यह महज अद्भुत किस्म के जंगली जीव को बचाने भर का मामला ही नहीं है, यह देश की जेनेटिक संपदा को बचाने का मामला भी है। ये कुदरत के वे खजाने हैं जहां न जाने कितनी जनकारियां भरी पड़ी हैं- जीव जगत की जनकारियां, जीव-जंतुओं, पेड़-पौधों और कीट-पतंगों की आपसी रिश्तों की जानकारियां।
बाघ को बचाने का मामला सिर्फ एक प्रजाती को बचाने भर का मामला नहीं है, यह ऐसे मामलों में हमारी सोच और सामथ्र्य की परीक्षा भी है। इसके लिए कुशल प्रबंधन की जरूरत भी है ताकि महज इसी वजह से वनवासियों को उनके अधिकारों और आवास से बेदखल न किया जाए। 2010 का भारत एक अमीर भारत है। 1973 के मुकाबले इसकी आबादी भी काफी ज्यादा है और यह विकसित भी काफी हो गया है। पर अब उसे ऐसी महारत और ऐसे नागरिक संस्थानों की जरूरत है जो विज्ञान का सटीक इस्तेमाल करके बाघों को बचा सकें।
वन संरक्षण
केन्द्र सरकार ने क्षतिपूरक वनीकरण के उद्देश्य से एक कोष निर्मित करने की गरज से क्षतिपूर्ति वन्यीकरण अधिनियम २००८ का प्रारूप तैयार किया है । जंगलो (यहां तक के सुरक्षित वनों तक को भी ) गैर वन्य उद्देश्यों से उजाड़ने के एवज में लिए जाने वाले शुल्क को इस मद के अंतर्गत लाए जाने की योजना है । परविर्तित वनों के क्षतिपूरक मूल्य की गणना के लिए शुद्ध वर्तमान मूल्य (एनपीवी) को एक आर्थिक औजार के रूप में मान्य किया गया है । सरकार के इस कदम पर दोहरे सवालिया निशान लग रहे हैं । पहला तो इस तरह उजाड़ने के एवज में क्या उनका मात्र आर्थिक मूल्यांकन भर करना पर्याप्त् होगा जबकि उनके पर्यावरणीय एवं सांस्कृतिक महत्व से सभी अच्छी तरह वाकिफ हैं । दूसरा, वनों जैसी महत्वपूर्ण इकाई की क्षतिपूर्ति के मूल्यांकन के लिए क्या एनपीवी एक उचित तरीका है ? पहले वनों के आर्थिक मूल्यांकन की बात करें । इसके अंतर्गत वनों से प्राप्त् होने वाले उत्पादों एवं सेवाऔं के आर्थिक मूल्यांकन की बात आती है । प्रारूप में वन उत्पादों में गैर काष्ठ वन उत्पाद और जल का उल्लेख है तो वहीं दूसरी ओर इससे प्राप्त् होने वाली सेवाऔं जैसे चरनोई, वन्य जीव संरक्षण, कार्बन अवशेष एवं खाद्य नियंत्रण को भी इसमें शामिल किया गया है । प्रारूप में वनो की सांस्कृतिक एवं शैक्षिक सेवाऔं का भी उल्लेख है । किंतु क्या मात्र आथिक क्षतिपूर्ति से इन सेवाऔं की वास्तविक क्षतिपूर्ति हो पाएगी? उदाहरण के लिए नीलगिरि के ऊपरी छोर के शोला-घास मैदानों के पर्यावरणीय महत्व को देखें । यहां फैले विस्तृत घास के मैदानों के बीच जंगल सालभर हरा-भरा रहता है । मानसून उपरांत यहां की शोला घास धीरे-धीरे पानी को अपने से पृथक कर नीचे कोंगू के मैदानी इलाकों के लिए छोड़ती है । जरा विचार कीजिए कि विकास के नाम पर इन शोला और घास मैदानों के साथ छेड़छाड़ की जाए तो क्या आर्थिक क्षतिपूर्ति इस जटिल अंर्तसंबंध की भरपाई कर पाएगी ? नीलगिरि के मैदानों इलाकों में कागज उद्योग के लिए यूकिलिप्ट्स वृक्षारोपण हेतु घास के मैदानों को उजाड़ने के दुष्परिणाम हम पहले भी भुगत चुके है । इसने उसे क्षेत्र की प्राकृतिक जल प्रणाली को हमेशा के लिए प्रभावित कर दिया है । क्षेत्र में जंगलीघास और कीट प्रजाति की विविधता का भी बड़े पैमाने का ह्रास हुआ । चूँकि ये घास के इलाके सदियों से स्थानीय टोडा समुदाय के लिए भौतिक एवं परमपरा के स्त्रोत रहे है अतएव यूकिलिप्टस वृक्षारोपण ने इनकी जीविका और पारम्परिक विद्यानों पर सीधा प्रहार हुआ । देश में ऐसे कई वन प्रदेश है जो आज भी पर्यावरण और संस्कृति को अपने योगदान से जीवित रखे हुए है । कर्नाटक स्थित बिल्लिगिरि रंगास्वामी मंदिर अभयारण्य को ही लें । यह वन पर्याविदों के बीच अपनी जैव विविधता के लिए जाना जाता है । दूसरी ओर सोलिगा जनजाति सदियों से पीढ़ी दर पीढ़ी यहां निवास कर रही है और इन्हीं वनों पर आश्रित है । ये वन उनकी संस्कृति का आधार है । इससे नीचे बसे चामराजनगर के मैदानी इलाकों की जलआपूर्ति इन्हीं वनों की वजह से सुनिश्चित है । अब अगर इन्हें उजाड़ दिया जाएगा तो इतनी सारी वन्य प्रजातियों, जैव प्रजातियों और जनजातीय लोगों के अस्तित्व की क्षतिपूर्ति किस तरह होगी ? आरक्षित वनों के बारे में हमारी सोच का विस्तृत होना आवश्यक है क्योंकि ये हमारी अमूल्य धरोहरें हैं । ऐसी महत्वपूर्ण धरोहरों की एनपीवी तय करते समय हमें इनसे मिलने वाले समस्त लाभों को हासिल करने की लागत की न सिर्फ गणना करनी होगी बल्कि इन्हें उजाड़ने के अतिरिक्त मौजुद अन्य बेहतर विकल्पों के बारे में भी सोचना होगा । मान लीजिए कि हम बहुत ही उन्नत वैज्ञानिक तरीके से इस एनपीवी को तय भी कर लें और उस हिसाब से अवनीकृत किए जाने उस समूचे क्षेत्रफल का कुल मूल्य ज्ञात कर कोष में जमा भी कर दें तो भी क्या हम उस कोष से उतनी उपयोगिता के सारे संसाधन जुटा पाएंगे ? एनपीवी कोष को एक अपेक्षाकृत कम महत्वपूर्ण भूमि पर खर्च करना क्या अपने आप में ही नया सवाल नहीं खड़ा करता ? मौसम परिवर्तन के नजरिए से देखते हुए अगर एनपीवी निर्धारित करते समय पर्यावरण और सांस्कृतिक लाभों को अतिरिक्त महात्व दे दिया जाएगा तो भू-उपयोग के परिवर्तन की अनुमति मिलने की संभावना भी प्रबल हो जाएगी । इससे विभाग में इसके जरिए कोष जुटाने की प्रवृत्ति भी बढ़ जाएगी और कहीं एनपीवी कम आंकी गई तो परिवर्तन के लिए मांग भी अचानक बढ़ जाएगी । पर्यावरण से नुकसान की क्षतिपूर्ति के लिए एनपीवी जैसे आधार के चुनाव के साथ एक अन्य समस्या यह भी है कि एक प्रकार के वन के लिए औसत प्रति इकाई मूल्य उस समूचे क्षेत्र के वैविघ्यपूर्ण पर्यावरण संबंधी लाभ, सामाजिक-सांस्कृतिक लाभ व आर्थिक लागत और लाभ संबंधी प्रावधानों को समुचित रूप से परिलक्षित नहीं करता है । एनपीवी निर्धारण के लिए एक पृथकीकृत बहुआयामी सोच के द्वारा समस्या सुलझाई जा सकती है । पर्यावरण और सामाजिक लाभों की क्षतिपूर्ति के लिए आवश्यक एक प्रणाली के निर्माण के लिए सच्ची राजनैतिक इच्छाशक्ति की दरकार है
बाघों का अवैज्ञानिक पुनर्वास चार वर्षो के लम्बे अंतराल के बाद सरिस्का पुन: अपने यहां बाघों की चहल- पहल देख रहा है । रणथम्भौर से बाघ का एक जोड़ा यहां लाकर छोड़ा गया है। आजादी के बाद से पहला मौका है जब बाघ प्रजाति के किसी जानवर को इस तरह किसी अन्य वन्य में ले जाकर छोड़ा गया है । इस परियोजना में राजस्थान के वन विभाग, भारत सरकार और वन्य जीवन संस्था का सहयोग रहा है तो इससे बाघों की मौजूदा छोटी जनसंख्या के अनुवांशिक प्रबंधन को भी दिशा मिल जाएगी । पिछले कुछ दशकों में बाघ अभ्यारण्यों के आसपास रिहायशी और खेतीहर गतिविधियों में बहुत बढ़ोतरी हुई है जिसकी वजह से अभ्यारण्य एक दूसरे से पूरी तरह कट गए हैं अतएव सिंह प्रजाति के लिए स्थान परिवर्तन की संभावनाएं खत्म सी हो गई हैं । अभ्यारण्य के बाघों की कम जनसंख्या की वजह से आनुवांशिक अलगाव की परिणति अंत: प्रजनन में होगी । रणथम्भौर में भी ज्यादा बाघ नहीं है । यहां १९७३में प्रोजेक्ट टाइगर प्रारंभ करते समय वन- विभाग ने इनका आंकड़ा १३ बताया था । इन ३५ सालों में यह संख्या घटती - बढ़ती रही है । रणथम्भौर में बाघ की मौजूदा आबादी इन्हीं १३ मूल निवासियों की संतति है अत: इनके अंत: प्रजनन की प्रबल संभावना है । अतएव इसमें विस्तृत अध्ययन की दरकार है । सरिस्का में स्थानीय प्रजाति का वंश विषयक अध्ययन हो पाता इसके पूर्व ही वहां से बाघ विलुप्त् हो चुके थे । सरिस्का की इस बाघ बसाहट को अब वंश विषयक विविधता की आवश्यकता है । जानवरों के हित में इस दिशा में कार्य होना चाहिए परंतु ऐसा प्रतीत होता है कि इस दिशा में महत्वपूर्ण आयामों की उपेक्षा की गई है । बाघों की पुर्नबसाहट के लिए अग्रिम योजना के साथ ही वर्षो का मैदानी अध्ययन और इसके पश्चात् लम्बे समय तक लगातार निरिक्षण की आवश्यकता होगी ।
पर्यावरण का धर्म
सृष्टि में दृश्यमान और अदृश्यमान शक्तियों में संतुलन होना ही योग है । योग ब्रह्मांड को ही नियमित एवं संतुलित नहीं रखता वरन हमारी देह को भी संतुलित रखता है , क्योंकि जो कुछ भी ब्रह्मांड में है वही हमारी देह पिण्ड में भी है । आज का युग धर्म और विज्ञान पर आधारित है । क्योकि विज्ञान तत्व है तो धर्म शक्ति । प्रकृति और पर्यावरण को भी तभी संतुलित रखा जा सकता है जब कि हम पर्यावरण के धर्म का पालन निष्ठापूर्वक करें। शक्तियों का संतुलन ही पर्यावरण का धर्म है । पर्यावरण का धर्म रहस्यमयी विज्ञान है जिसमें सत्कर्म का संज्ञान है । नियति का विधान है और राष्ट्र का संविधान भी है । हमारा जीवन धर्माधारित होगा तो पर्यावरण भी जीवन्त रहेगा । हम सभी पर्यावरण का अंग है । हमें अपने पर्यावरण से सामंजस्य बनाना होता है । सभी जीव-जन्तु और मनुष्य अन्योन्याश्रित हैं और परस्पर पूरक भी है। शांतिपूर्ण सामंजस्य के लिए समन्वय जरूरी है । किन्तु आज सम्पूर्ण मानवता पर्यावरण और प्रकृति के ध्वंस को देख रही है । यह संसार ईश्वर द्वारा रचित है । हम भी ईश्वर की सर्वश्रेष्ठ कृति के रूप में इस सुन्दर रचना संसार के अंग है तथा हमें प्रकृति उपादान उपांग धरती अम्बर हवा पानी अग्नी आदि के प्रति कृतज्ञ भाव रखना चाहिए क्योकि पंचतत्वों की अक्षरता-अक्षुण्णता ही हमारे भी अस्तित्व का आधार है । अंतरिक्ष के तत्व प्रेरक होते है । वायु हमारी भावना विचार और वाणी की संवाहक है । अग्नि तत्व की दहकता पवित्र और पावस करती है । जल जीवन दाता है इसलिये कहा जा सकता है कि जल ही जीवन है। मातृ वत्सला धरती हमारी पोषक है । माटी से ही हमारी देहयष्टि बनती है । मानवीय स्वास्थ्य हमारी देह की भौतिक तथा मानसिक स्थिति के साथ-साथ ऊर्जस्विता पर भी निर्भर करता है । जब हमारे चारों ओर का ऊर्जा क्षेत्र श्रेयस, सकारात्मक और प्रभावशाली होता है तो हम भी पूर्ण उत्साहित, उल्लासित, तेजस्वित एवं आनंदित रहते है और प्रसाद मुद्रा में रहते है । धर्म मनुष्यता का संरक्षक और ईश्वरीय आशीर्वाद है । धर्म ही समस्त संसारों की प्रकृति एवं स्थिति का कारण है । संसार में मनुष्य ही श्रेष्ठता का निर्वहन और धर्म का अनुसरण करने को कृत-कृत्य है । धर्म से पाप दूर होता है । ग्लानि दूर होती है । समस्त चराचर जगत धर्माधारित है । धर्म को ही सदैव वरेण्य वंदनीय और श्रेष्ठ बतलाया गया है । महाभारत में महर्षि व्यास का उद्भाव है -धारणाद धर्ममित्याहू: धर्मो धारयते प्रजा:।यत् स्याद धारणसंयुक्त सधर्म इति निश्चय:।।उन्नति हि निखिला जीवा धर्मेणैव क्रमादिह। विद्धाना: सावधाना लाभन्तेडन्ते पर पदम्।। धारण करने को ही धर्म कहा है। धर्म ने ही समस्त संसार को धारण कर रखा है । जो धारण है संयुक्त है वही धर्म है यह निश्चित है । धर्म के द्वारा ही समस्त जीव उन्नति तथा लाभ पाते हुए अतं में परमपद को प्राप्त् होते है। अत: जिन शुभ कार्यो से सुख शान्ति ज्ञान आदि सदगुणों का विकास और वृद्धी हो अर्थात शारीरिक आत्मिक एवं मानसिक उन्नति हो वही धर्म है । पर्यावरण के धर्म का आधार प्रेम है । प्रकृति ही प्रेम की प्रमेय है । प्रेम का प्रलेख तो प्रकृति के कण-कण में प्रतिक्षण है । प्रेममय रहना सिखाती है । जहाँ प्रेम होगा वहाँ त्याग भी अवश्य ही होगा । त्याग संगतिकणका प्रतिफल होता है । सत्संग का प्रतिफल होता है जिसमें प्रथम क्रिया के बाद एक तत्व का दूसरे तत्व के साथ संयोग होता है । त्याग से दान का भाव आता है । ऋतु का भाव आता है । ऋतबद्धता तथा ऋतुबद्धतातय का ही एक रूप है । वैदिक मान्यता के अनुसार सम्पूर्ण ब्रह्मांड में ही एक प्रकार से यज्ञ चक्र अहिर्मिण चलता है । ऋतु का आशय वस्तुत: इलेक्ट्रोन तथा प्रोटोन का प्रकटीकरण ही है । त्याग और समर्पण ही समन्वय के सूत्र है । यही हमारी एक्यता के पोषक हैं । सामंजस्य के सोपान हैं । सामंजस्य सदैव शांतिदायक होता है । कहने का तात्पर्य है कि प्रेम, त्याग, समन्वय, शांति आदि ही पर्यावरण के धर्म के अंग है इन्हें हमें अवश्य ही अंगीकार एवं आत्मसात कर लेना चाहिए । जिस तरह ब्रह्मांड अपरिमित शक्ति का स्रोत है उसी तरह हमारी देह भी शक्तिपुंज है । पितृत्व शुक्राणु सुक्ष्मातिसूक्ष्म होने पर भी जीव सत्ता का निर्माण करता है उसमें देहाणु रूप में देहांग हाथ पैर आदि अंग-प्रत्पंग बीज रूप में होते हैं । गर्भ-क्षेत्र में बीजारोपण एवं अंकुरण अर्थात स्त्रीत्व डिम्ब से मिलन के पश्चात जब भ्रूण बनता है तो भ्रूण अपने भू्रणीय रक्षा कवच में ही सामर्थ्य एवं शक्ति का संचय करने लगता है वह गर्भस्थ रहते हुए भी प्रकृति पारिस्थितिकी एवं पर्यावरण से तालमेल बनाना सीख जाता है उसके रोम रोम में शक्ति का संचय होने लगता है चैतन्यता एवं जीवन्तता का अभ्युदय होता है । ब्रह्मांड की तरह हमारी देह संरचना में भी पांचभूत तत्व लगभग उसी अनुपात में समाहित है हमारी दृश्यमान भौतिक देह के आसपास कुछ अदृश्य परतें भी होती है जिन्हें पारलोकिक मानवीय (ईथरिक) देह कहते हैं इसीलिए हमें कुछ अतीन्द्रिय संज्ञान भी होता है तथा उन बातों का अहसास भी रहता है जो हमारे लिए अद्भुत होता है । यह अदृश्य वायवीय आवरण, विद्युतीय, चुम्बकीय या तापीय या इनका मिला जुला रूप हो सकता है । वायवीय परतो में विद्युत परत ओरा का निर्माण करती है। इसी ओरा के प्रभाव के कारण की हम किसी से प्रभावित या अप्रभावित होते है । ओरा विस्तृत हमारी तेजस्विता का परिचायक है । हमारा ओरा हमारी आंतरिक प्रवृत्तियों, अत: करण के भावों के साथ साथ प्रकृति और पर्यावरण से भी प्रभावित होता है । यदि हम पर्यावण के धर्म का पालन सुरूचिपूर्ण ढंग से करते हैं तो हमारी तेजस्तिता उज्जवल रहती है निर्मल रहती हैं सकारात्मक रहती है स्वस्थ्य रहती है और सुखद रहती है । पर्यावरण का धर्म कहता है कि हम धरती, जल वायु, अग्नि और आकाश को संतुलित रखें । हमारी धरती हमारा जीवनाधार है जो अपनी गोद में हमे खिलाती है । पार्थिव सकारात्मकता ही हमें स्थायित्व तथा दृढ़ता प्रदान करती है। धरती ही अनुपयुक्त ऊर्जाऔं का अवशोषण करती है । प्रदूषणों को भी अवशोषित करती है । पृथ्वी पर जल की उपलब्धता पर ही हमारा जीवन निर्भर है जल ही हमें द्रव्यता प्रदान करता है । हमारी देह में ८० प्रतिशत जल होता है। जल ही अवांछनीय ऊर्जा का विलायक और प्रवाहक है । जल ही हमें शुद्ध एवं निर्मल रखता है । शुद्धता से सुचिता रहती है । वायु तो प्राणों का आधार है । वायु हमारे मन-मस्तिष्क की नियामक भी है । वायु हमारे शब्दों की वाहक है । हमारे मन-मस्तिष्क की नियामक भी है । वायु हमारे शब्दों की वाहक है । हमारे विचारों का आदान प्रदान वायु के माध्यम से ही वाणी द्वारा होती है । बौद्धिकता की शोधक भी वायु ही है । वायु ही शक्ति की प्रस्तोता है । जल और वायु के माध्यम से ही हमारी देह में अणुआ का संचालन होता है जिससे देह में संतुलन बना रहता है । अग्नि तत्व भी शक्तिशाली होता है मृदुलता तथा कठोरता की निर्धारक अग्नि ही होती है जो पदार्थों को भस्मीभूत कर प्रकृति के सत्य को प्रकट करती है । अग्नि से ही प्रकाश उत्पन्न होता है । प्रकाश से ही जीवन चैतन्यता है । प्रकाश की उपस्थिति ही हमारे पौषण का आधार है । हमारे नकारात्मक भाव प्रकाश की उपस्थिति से ही शामिल होते है । अग्नि और प्रकाश से संकल्प शक्ति मिलती है इसलिए अग्नि के समक्ष ही कसमें खाई जाती है और शपथ ली जाती है । प्रकाश की उपस्थिति में हमारी अशुद्ध ऊर्जा शुद्ध ऊर्जा में परिवर्तित हो जाती है । आकाश तत्व तो प्रत्यक्ष रूप से हमारी चेतन्य शक्ति से जुड़ा है । आकाश अनंत है वह महतो महीयान है जो हमे भी अनंतता और दिग दिगन्तता प्रदान करता है । ईश्वरीय वितान के रूप में हमे सुरक्षा से आच्छादित रखता है । सभी अन्योन्यश्रित ब्रह्मांडीय शक्ति एवं ऊर्जा हमें प्रकृति ओर पर्यावरण के धर्म पालन से ही सुलभ है । हमारा धर्म हमारे नियमित खुशहाल जीवन, सामाजिक धारणाऔं एवं वर्जनाऔं के साथ-साथ पर्यावरण एवं प्रकृति का भी आवश्यक एवं महत्वपूर्ण हिस्सा है । हमारे वेद पुराण उपनिषद एवं अन्य धर्मो के ग्रन्थों में भी दो प्रमुख तत्व प्रकृति तथा पुरूष का उल्लेख है । ब्रह्मांड रचयिता ब्रह्म ही प्रकृति तथा पुरूष के सर्तक और जनक है अत: प्रकृति और पुरूष में समन्वय जरूरी है संवाद जरूरी है । किन्तु हमारी अज्ञानता के कारण हम प्रकृति और पर्यावरण के प्रति अपने धर्म को भूल रहे है नैतिकता को भूल रहे हैं नैसर्गिकता से हम दूर हो रहे हैं । प्रकृति से हम दूर हो रहे है तथा प्रकृति पर मानवीय हस्तक्षेप बढ़ रहा है अत: पर्यावरण पर नये विषय के साथ नई सोच बनाने की महती आवश्यकता है। प्रकृति और पर्यावरण तो अपना धर्म निश्चित रूप से निभाते है प्रकृति की समस्त क्रियाएँ समय पर हमें स्वयमेव सुलभ होती है प्रकृति के किंचित भी विचित्र होने पर हम विचलित हो जाते है । क्या हम भी ईमानदारी से अपना पर्यावरणीय धर्म निभाते है यह विचारणीय प्रश्न है । क्या हम पेड़ पौधौं वनस्पतियों एवं अन्य जीव जन्तुआ की रक्षा एवं संरक्षण करते हैं क्या हम जल वायु आकाश धरती अम्बर को प्रदूषण रहित स्वच्छ रख पा रहे है । क्या हमारी जीवन शैली प्रकृतिपरक एवं योग क्षेमकारी है सबका उत्तर नकारात्मक ही मिलेगा । हमें प्राकृतिक सम्पदा का संरक्षण करना होगा उपभोक्तावाद से बचना होगा । पर्यावरण के प्रति अपने नैतिक दायित्वों का निर्वहन करते हुए उत्तरदायी बनना होगा । प्राकृतिक प्रक्रमों में संतुलन बनाना होगा अपनी संस्कृति संस्कार कर्तव्य तथा व्यवहार को सुधरना होगा । अतएव हममें से प्रत्येक को प्रकृति प्रेमी एवं पर्यावरणवादी बनना होगा ।
ग्लोबल वार्मिंग पर वैज्ञानिकों की रिपोर्ट पर्यावरण वैज्ञानिकों ने भविष्य में ग्लोबल वार्मिंग की भयावह तस्वीर पेश करते हुए कहा है कि वर्ष २०३० तक यह लोगों को ध्रुवीय क्षेत्रों पर शरणार्थी बनकर रहने को मजबूर कर देगा । ओलिंपिक खेल सिर्फ साइबर स्पेस पर आयोजित होंगे और आस्ट्रेलिया का मध्य क्षेत्र पूरी तरह निर्जन हो जाएगा । पर्यावरण संरक्षण के लिए काम करने वाली ब्रिटिश संस्था फोरम फार द फ्यूचर और ह्रूलिट पैकर्ड प्रयोगशाला के वैज्ञानिकों ने अपनी यह ताजा रिपोर्ट पर्यावरण को हो रहे नुकसान की ओर लोगों का ध्यान खींचने और इससे निबटने के उपायों को लेकर जन जागरूकता अभियान के लिए जारी की है । रिपोर्ट में कहा गया है कि मौजूदा वैश्विक आर्थिक संकट ने दुनिया की अर्थव्यवस्थाऔं की जिस कदर चूलें हिला दी हैं उसी तरह एक दिन ग्लोबल वार्मिंग की समस्या भी अर्थव्यवस्थाऔं में ऐसा ही भूचाल लाएगी । फोरम के अध्यक्ष पीटर मैडन के मुताबिक यह रिपोर्ट कोरे कयासों पर नहीं बल्कि पूरी तरह वैज्ञानिक अनुसंधान और तथ्यों पर आधारित है । यह धरती की भविष्य की तस्वीर पेश करती है, जो निश्चित रूप से अच्छी नहीं कही जा सकती । श्री मैडन ने कहा कि चीजों को सुधारने का अभी भी वक्त है लेकिन इसके लिए पारंपरिक ऊर्जा स्रोतों के स्थान पर स्वच्छ और हरित ऊर्जा के इस्तेमाल को बढ़ावा देना, कम कार्बन उत्सर्जन वाली गतिविधियों पर ध्यान देना और प्राकृतिक स्रोतों के अंधाधुंध दोहन पर अंकुश लगाना होगा । उन्होने कहा भविष्य के इतिहासकार हमारे युग को जलवायु परिवर्तन के युग के नाम से पुस्तकों में दर्ज करेंगे ।
धरती माता क्रोधित है
जैसा कि मालूम ही है कि यह वर्ष 2010 आजतक के जाने हुए इतिहास में सबसे अधिक गरम वर्ष रहा है, बताने की आवश्यकता नहीं क्योंकि इसे हम सब भुगत ही रहे हैं। जिससे मिलो यही कह रहा है कि अपने जीवन में आज तक ऐसी गर्मी हमने नहीं झेली। यह तो एक दिन होना ही था क्योंकि जिस प्रकार से हमने अपनी धरती माता का शोषण किया है- लगातार जंगल काटते चले गए हैं, नदियों को प्रदूषित किया है, पहाड़ उजाड़ कर दिए, खनिज और तेल के नाम पर उसे खोखला कर डाला, तो ऐसे में धरती मां हमें आशीर्वाद तो नहीं ही देगी। उसके अभिशाप स्वरुप इस वर्ष आइसलैंड में आए ज्वालामुखी के कारण पूरे यूरोप में कई हफ्तों तक वायुयान सेवाएं बंद कर देनी पड़ी थीं। पिछले पांच- छह महीनों में इंडोनेशिया में दो- तीन बार भयानक भूकंप आ चुका है, इससे सुनामी का खतरा पैदा हो गया। इसी महीने अंडमान निकोबार में 7.5 स्तर का भूकंप भी आया जिसके कारण भी सुनामी की आशंका पैदा हो गई थी। ये दूसरी बात है सुनामी नहीं आई।
पिछले दो महीने से मेक्सिको की खाड़ी में ब्रिटिश पेट्रोलियम समुद्र की तली से जो तेल निकाल रहा है उस पाइप लईन में छेद हो गया जिसके कारण नित्य हजारों बैरल तेल निकलकर समुद्र के पानी में मिल रहा है, जिसके कारण बड़ी संख्या में समुद्री जीव- जंतु और पक्षी मर रहे हैं, इससे संयुक्त राज्य अमेरीका के कई राज्यों में पर्यावरण का गंभीर खतरा उत्पन्न हो गया है। स्थिति कितनी भयानक है वह इसी से समझा जा सकता है कि अमेरीका के राष्ट्रपति बराक ओबामा की नींद हराम हो गई है।
हाल ही में योरोप और भारत के अध्ययन दल ने धरती का तापमान बढऩे और हिमालय के ग्लेशियर के पिघलने के कारणों का अध्ययन करके जो जानकारी दी है वह दिल दहला देने वाली है। बताया गया है कि तापमान बढऩे के कारण ग्लेशियर के पिघलते चले जाने से नेपाल के अनेक छोटे- छोटे ताल- तलैये भारी झीलों में तब्दील हो गए है और यदि किसी चट्टान के सरकने से झील का पानी बहना शुरु हो गया तो नेपाल में ऐसी सुनामी आयेगी जिससे वहां की जनता, जीव- जंतु और वनस्पतियों का भारी विनाश होगा। तब बिल्कुल प्रलय का दृश्य होगा। और जहां तक हमारा सवाल है तो नेपाल की सीमाएं भारत से मिली होने और धरती का ढलान नेपाल से भारत की ओर होने के कारण नेपाल के भीतर की ये त्रासदी हमारे देश में भी उत्तर प्रदेश तथा बिहार में विनाश का भयानक तांडव करेगी।
यद्यपि यह भी अकाट्य सत्य है कि धरती माता के साथ जब- जब भी दुव्र्यवहार हुआ है और विनाश के रुप में उसने अपना तांडव दिखाया है तो उस विनाश को रोकने के लिए मनुष्य को ही प्रयत्न करने पड़े हैं। बाढ़, भूकंप, तूफान जैसी आपदाओं से बचने के उपाय अपने स्तर पर मानव स्वयं और वहां की सरकारें करती हैं। लेकिन जो सरकारें अपनी करतूतों से इस तरह के विनाश को स्वयं ही आमंत्रित करती हैं भला उनसे किसी उचित कदम की कैसे उम्मीद की जा सकती है। हमारे देश में भोपाल गैस कांड जैसी दुनिया की सबसे बड़ी औद्योगिक दुर्घटना घट जाती है जिसमें हजारों की जान चली जाती है पर हमारी सरकारें हैं कि अपनी जनता के दुख- दर्द की चिंता करने के बजाए जिनके कारण यह भयावह दुर्घटना हुई है उनको ही बचाने में लगी रहती है। ऐसे में भला हम यह कैसे उम्मीद कर सकते हैं कि आने वाले विनाश को रोकने की दिशा में पहले से ही कोई कदम उठाने के बारे में सोचा जाएगा।
जैसा कि ऊपर शीर्षक में ही कहा गया है कि धरती माता क्रोधित है और स्थिति ऐसी हो गई है कि किसी के पास इसका जवाब नहीं है कि इस विषम स्थिति से कैसे उबरा जा सकता है। उत्तर तो हमारे पास भी नहीं है लेकिन धरती को तन- मन से मां मानने वाले हम और हमारे सुधी पाठकों का ये फर्ज हो जाता है कि अपने निजी स्तर पर धरती माता का सम्मान हम सोते जागते करें और सम्मान करने का यह तरीका है अपने जीवन में जितने भी हरे पेड़ लाग सकें लगाएं, जितने भी नदी, ताल- तलैयां हैं उन्हें प्रदूषण मुक्त रखें। जंगल पहाड़, झरने, अभयारण्य आदि सभी प्राकृतिक पर्यटन स्थलों पर पर्यटक बन कर तो जाएं पर उन जगहों की रक्षा करें वहां पर पॉलीथीन जैसा, पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने वाला कचरा फेंक कर धरती के संतुलन को न बिगाड़ें।
इस प्रकार के प्रयास से हम अपनी अगली पीढ़ी को संदेश दें कि धरती माता जो वास्तव में हमारी जगत माता है उसका सम्मान करना और उसके क्रोध को शांत करने के लिए सक्रिय कदम उठाना हम सबका धर्म है।
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